शीतलाष्टमी (बसौडा) – चैत्र कृष्ण अष्टमी





sheetala

शीतलाष्टमी – चैत्र कृष्ण अष्टमी : Saturday, 26 March 2011

यह व्रत चैत्र कृष्ण अष्टमी या चैत्रमासके प्रथम पक्षमें होलीके बाद पडनेवाले पहले सोमवार अथवा गुरुवारको किया जाता है। इस व्रत को करनेसे व्रतीके कुलमें दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गन्धयुक्त फोडे, नेत्रोंके समस्त रोग, शीतलाकी फुंसियोंके चिन्ह तथा शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं। इस व्रत को करनेसे शीतला देवी प्रसन्‍न होती है।

स्कन्द पुराण में शीतला देवी शीतला का वाहन गर्दभ बताया गया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन(झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इन बातों का प्रतीकात्मक महत्व है। चेचक का रोगी व्यग्रतामें वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को हवा की जाती है, झाडू से चेचक के फोडे फट जाते हैं। नीम के पत्ते फोडों को सडने नहीं देते। रोगी को ठंडा जल प्रिय होता है अत:कलश का महत्व है। गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के दाग मिट जाते हैं। शीतला-मंदिरों में प्राय: माता शीतला को गर्दभ पर ही आसीन दिखाया गया है।

With an aim to cure small pox, Bhagwati Sheetla Devi is worshipped and a vow is observed on Chaitra Krishna Ashtami. On this day of Shitala Ashtami, Sheetala Devi is worshipped ceremoniously. Stale food is offered to the Goddess and then eaten by her devotees.

इस व्रतकी विशेषता है कि इसमें शीतलादेवीको भोग लगानेवाले सभी पदार्थ एक दिन पूर्व ही बना लिये जाते हैं अर्थात शीतलामाताको एक दिनका बासी (शीतल) भोग लगाया जाता है । इसलिये लोकमें यह व्रत बसौडाके नामसे भी प्रसिद्ध है।

एक थालीमें भात, रोटी, दही, चीनी, जलका गिलास, रोली, चावल, मूंगकी दालका छिलका, हल्दि, धूपबत्ती तथा मोंठ, बाजरा आदि रखकर घरके सभी सदस्योंको स्पर्श कराकर शीतलामाताके मन्दिरमें चढाना चाहिये। इस दिन चौराहेपर भी जल चढाकर पूजन करने का विधान है। किसी वृद्धको भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये।



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