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Navratri Vrat & Puja

30 September 2008 Email This Post Email This Post Print this post Print this post

 

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी ।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥

 

देवी का आवाहान, स्थापन और विसर्जन - ये तीनो प्रातःकालमें होते हैं । यदि नवरात्रपर्यन्त व्रत रखनेकी सामर्थ्य न हो तो (१) प्रतिपदासे सप्तमीपर्यन्त ‘अप्तरात्र’ (२) पंचमीको एकभुक्त, षष्ठीको नक्तव्रत, सप्तमी अयाचित, अष्टमीको उपवास और नवमीके पारणसे ‘पंचरात्र’ (३) सप्तमी, अष्टमी और नवमीके एकभुक्त व्रतसे ‘त्रिरात्र’ (४) आरम्भ और समाप्तिके दो व्रतोंसे ‘युग्मरात्र’ और (५) आरम्भ या समाप्तिके एक व्रतसे ‘एकरात्र’ के रुपमें जो भी किये जायँ, उन्हींसे अभीष्टकी सिद्धि होती है ।

देवीके नवरात्रमें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वतीका पूजन तथा सप्तशतीका पाठ मुख्य है । यदि पाठ करना हो तो देवतुल्य पुस्तकका पूजन करके १,३,५ आदि विषम संख्याके पाठ करने चाहिये ।

देवीव्रतोंमें ‘कुमारीपूजन’ परमावश्यक माना गया है । यदि सामर्थ्य हो तो नवरात्रपर्यन्त और न हो तो समाप्तिके दिन कुमारीके चरण धोकर उसकी गन्ध-पुष्पादिसे पूजा करके मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये। दसवर्ष तक की कन्या का ही पूजन करने का विधान है ।

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