उत्साह-संपन्नम् अदीर्घ-सूत्रं क्रिया-विधिज्ञं व्यसनेष्व् असक्तम् |
शूरं कृतज्ञं दृढ-सौहृदं च- लक्ष्मीः स्वयं वाञ्छति वास-हेतोः ||
Shri Krishna Govind Hare Murare, Hey Nath Narayana Vasudeva हे श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेवाय || हे आकर्षक तत्व मेरे प्रभो, इन्द्रियों को वशीभूत करो, दुःखों का हरण करो, समस्त बुराईयों का बध करो, मैं सेवक हूँ…….