Ghatasthapana कलश स्थापना – Mon, 31 March 2014 (9:22am to 10:53am IST)

Ghatsthapana : Chaitra (Vasant) Navratra

Ghatsthapana Day – Mon, 31 March 2014 (Chaitra Shukla Pratipada, V S 2071)

Kalash Sthapan - Ghatsthapan Muhurta (Auspicious Time)
1. घटस्थापन- कलश स्थापन मुहुर्त :  06:17 AM – 07:47 AM (Amrit Chaughadia)

2. Ghatsthapan Muhurta (Shubh Choghadia): 09:22 AM – 10:53 AM

3. Abhjit Muhurtha  -  12:01 PM to 12:50 PM

Note: Rahu Kaal- 07:48 AM to 09:21 AM (Avoid this period)

* Delhi, India Local Time (IST)

श्री गणेशजी और माँ भगवती का ध्यान और क्षमा प्रार्थना करते हुए अधिक से अधिक अभिजित मुहुर्त तक घटस्थापन संपन्न करें |

Ghatsthapan Muhurta for USA, Europe, Australia, Asia, Africa Cities

The first day of Navratra is called Ghatasthapana, which literally means pot establishing. On this day the kalash, (holy water vessel) symbolising Goddess Durga often with her image embossed on the side is placed in the prayer room. The kalash is filled with holy water and covered with cowdung on to which seeds are sown. A small rectangular sand block is made and the kalash is put in the centre. The surrounding bed of sand is also seeded with grains.

The Ghatasthapana ritual is performed at a certain auspicious moment determined by the pundits. At that particular moment the priest intones a welcome, requesting goddess Durga to bless the vessel with Her presence. At several places there is a tradition of sowing barley seeds during the Durga Puja - Navratri period. In this a small bed of mud is prepared in a little container and barley seeds are sown in it. This is placed in the Puja room and cared for during the Navratri period. At the end of  Navratri the shoots reach a height of 3-5 inches. These are pulled out and given to devotees as form of blessings.

How to perform Durga Puja / Navratra

नवरात्रका प्रयोग प्रारम्भ करनेके पहले सुगन्धयुक्त तैलके उद्वर्तनादिसे मङ्गलस्त्रान करके नित्यकर्म करे और स्थिर शान्तिके पवित्र स्थानमें शुभ मृत्तिकाकी वेदी बनाये । उसमें जौ और गेहूँ – इन दोनोंको मिलाकर बोये । वहीं सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टीके कलशको यथाविधि स्थापन करके गणेशादिका पूजन और पुण्याहवाचन करे और पीछे देवी ( या देव ) के समीप शुभासनपर पूर्व ( या उत्तर ) मुख बैठकर

“मम महामायाभगवती ( वा मायाधिपति भगवत ) प्रीतये ( आयुर्बलवित्तारोयसमादरादिप्राप्तये वा ) नवरात्रव्रतमहं करिष्ये ।”

यह संकल्प करके मण्डलके मध्यमें रखे हु‌ए कलशपर सोने, चाँदी, धातु, पाषाण, मृत्तिका या चित्रमय मूर्ति विराजमान करे और उसका आवाहन आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्त्रान, वस्त्र, गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, नीराजन, पुष्पाञ्जलि, नमस्कार और प्रार्थना आदि उपचारोंसे पूजन करे । स्त्री हो या पुरुष, सबको नवरात्र करना चाहिये । यदि कारणवश स्वयं न कर सकें तो प्रतिनिधि ( पति – पत्नी, ज्येष्ठ पुत्र, सहोदर या ब्राह्मण ) द्वारा करायें ।  नवरात्र नौ रात्रि पूर्ण होनेसे पूर्ण होता है । इसलिये यदि इतना समय न मिले या सामर्थ्य न हो तो सात, पाँच, तीन या एक दिन व्रत करे और व्रतमें भी उपवास, अयाचित, नक्त या एकभुक्त – जो बन सके यथासामर्थ्य वही कर ले ।

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